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कालसर्प दोष: क्या है, और शास्त्र क्या कहते हैं

लोक-मान्यता में कहा जाता है कि जब सातों ग्रह (सूर्य से शनि तक) राहु-केतु की धुरी के एक ही ओर हों, तो "कालसर्प" बनता है। इसकी बहुत चर्चा होती है, और अक्सर इसके नाम पर महँगी पूजा बेची जाती है। यहाँ ईमानदार बात।

शास्त्रीय ग्रंथों में यह नहीं है

हमारी टीम ने शास्त्रीय ग्रंथ पेज-दर-पेज पढ़े हैं — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र (BPHS), फलदीपिका, सारावली, बृहज्जातक, जातक पारिजात, उत्तरकालामृत, सर्वार्थचिंतामणि, प्रश्नमार्ग आदि। इनमें से किसी में "कालसर्प योग" या "कालसर्प दोष" का वर्णन नहीं है। यह बाद की परंपरा है। कुछ ग्रंथों में "सर्प-दोष" या "सर्पशाप" दूसरे प्रसंगों में आता है (जैसे BPHS के संतान वाले अध्याय में), पर वह अलग स्थिति है और उसके उपाय भी साधारण हैं — पूजा-प्रार्थना और दान।

हमारा रुख़

वैदिक दोस्त कालसर्प से कोई भविष्यवाणी नहीं करता, और इससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं। कुंडली ग्रहों के बल, भाव, योग और चल रही दशा से पढ़ी जाती है — किसी एक प्रचलित नाम से नहीं। इस स्थिति वाले लाखों लोग ख़ुश और सफल जीवन जीते हैं।

मन हो तो ये करें

ये सब मुफ़्त हैं। किसी पैसे वाली पूजा की ज़रूरत नहीं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या BPHS में कालसर्प दोष है?

नहीं। कालसर्प योग न BPHS में मिलता है, न हमारे पढ़े दूसरे शास्त्रीय ग्रंथों — फलदीपिका, सारावली, बृहज्जातक आदि — में। यह बाद की परंपरा है।

क्या कालसर्प पूजा करवानी ज़रूरी है?

नहीं। वैदिक दोस्त कोई पैसे वाली पूजा नहीं सुझाता। मन हो तो जप, दान और अच्छी आदतें काफ़ी हैं, और ये मुफ़्त हैं।

क्या कालसर्प से सफलता रुकती है?

शास्त्रों में ऐसा कोई नियम नहीं है। सफलता ग्रहों के बल, भाव, योग और दशा से देखी जाती है। इस स्थिति वाले बहुत से लोग सफल हैं।

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